कहते है !टूटे दिल की कोई ,आवाज नही होती ,
टूटे पंखों से आसमां में 'परवाज़ नही होती ।
दिल खटाक से टूटकर ,चूर -चूर हो गया ,
पंक्षी बिना पंखों के भी ,आसमां में फुर्र हो गया ,
'कमलेश 'हो वक्त बेरहम तो , हर पांसा फांस जाता है ,
हो वक्त बा-वफा तो इन्सां , जहर को भी चांट जाता है ॥
इस आलम में हर तरफ, फैली क्यूँ बदहवासी है ,
नूर भरे चेहरों पर छाई , ये कैसी सर्द उदासी है ।
क्यों ? नही गर्म जोशी से थामते ,इक दूसरे का हाथ ,
क्या ? इसमें भी कोई साजिस रची सियासी है ।
हम साया जो रहे , दुखो-दर्द का साया बन कर ,
कत्लो -गारत की उनकी नियत, क्यों बनी पिशाची है!!!
जिस बात को समझने में , मुद्दतें लगा गयी इनकी पुश्तें ,
इन्सान-इंसानियत को समझे , बस इतनी बात जरा सी है ...!
'कमलेश' खौफ जदा चेहरों में लाश, इंसानियत की दिखती है ,
है कोई ज़रूर नश्तर चुभा दिल में,सबको लगता है बात जरा सी है ..!!!
रिमझिम -रिमझिम मेघ बरसता ,गिरती बूँदें शाखों से ,
याद के बादल जब-जब छाये ,निर्झर निकला आँखों से ।
देख उमड़ते मेघों को ,मोर -मोरनी संग नाचे ,
पिया बसे परदेश जा, सजनी बैठी पाती बांचे ।
मौसम बैरी इस विरहन की ,मिलन की आग जलाये ,
आ जाओ इस विरह घड़ी में, बैठी हूँ आस लगाये ।
बहुत सुहाना मौसम है , वक्त बड़ा ही सुंदर है ,
मन की आँखों से तुम पढ़ लो , जो मन के अंदर है,
'कमलेश ''वर्षा -ऋतु में नव जीवन का संचार हुआ ,
हरी-भरी हो गयी धरती ,आनंदित सारा संसार हुआ ॥
गर मन की सुनते तो हाथ भी ना मिलते ,
दोस्ती की बात तो दूर रही, साथ भी ना चलते ।
मन की कुछ बातें कभी-कभी, बड़ी अजीब होती हैं ,
जिससे नफरत करता है, उसी के बहुत करीब होती है ।
मन की सुनो तो हमेशा, जिंदगी मुड़ जाती है ,
जिस को चाहते वही तार ,अपने आप जुड़ जाती है ।